पांचाल घाट के पावन तट पर गंगा पुल के नीचे बनी आश्रम स्थली आस्था और त्याग की अद्भुत मिसाल पेश कर रहे है। फिरोजाबाद जिले से आए संत रामदास त्यागी, जिन्हें श्रद्धालु टाटमबरी बाबा और मौनी संत के नाम से जानते हैं। इन दिनों गंगा तट पर भक्ति और सेवा में लीन हैं। संत बताते हैं कि 11 साल की उम्र में हनुमान जी कृपा से भगवान की भक्ति में लगन गई, और संत बालाराम दास महाराज के सानिध्य में पहुंच गए सांसारिक मोह-माया का त्याग कर दिया। तभी से वे त्यागी बाबा के नाम से जाने जाते हैं। त्याग और तपस्या की प्रतीक उनकी जटाएं दर्शा रही हैं। बाबा कहते है कि गुरु के परलोक जाने के बाद कटवाई थी। वर्तमान में उनकी जटाएं 20 वर्ष की हो गई हैं। जिनकी लंबाई करीब सात फुट की है। बाबा 14 वर्षों तक मौन धारण कर कठोर तप की इसी कारण वे मौनी संत के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। धूप खिलने से संत अपनी कुटिया से बाहर आकर धूप में जटाओं को फैलाकर बैठे हुए थे। सात फीट की जाटाएं एक आकर्षण का केंद्र हैं। बाबा कहते कि जटाओं को धूनी की भस्म चढ़ाए जाने से बनाई है। जब वह अपनी जटाओं को बांधते हैं तो साफा बन जात है।