अयोध्या के पूरा बाजार में श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण से मनुष्य को आध्यात्मिक शांति मिलती है और जीवन को नई दिशा प्राप्त होती है। श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान, कर्म और भक्ति का पावन संगम है। यह भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों का अनमोल भंडार है। यह बातें कुम्हिया रसूलाबाद में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य ज्ञानचंद्र द्विवेदी ने कहीं। उन्होंने कहा कि महर्षि वेदव्यास रचित श्रीमद्भागवत में वेदों के गूढ़ तत्वों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इसके 12 स्कंधों में वेद, शास्त्र और पुराणों के सार का समावेश है। कथा का श्रवण किसी सांसारिक फल की कामना से नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण भाव से करना चाहिए। आचार्य ने राजा परीक्षित के जन्म, कलियुग के प्रभाव और भीष्म पितामह की स्तुति का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि ऋषि शमीक के अपमान पर उनके पुत्र श्रृंगी ने राजा परीक्षित को सातवें दिन तक्षक नाग के डसने का श्राप दिया था। इसके बाद राजा ने राजपाट का मोह त्यागकर गंगा तट पर शुकदेव जी से भागवत कथा सुनी। भीष्म पितामह की भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अटूट भक्ति और समर्पण का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए। कथा के अंत में मुख्य यजमान राजेंद्र बहादुर सिंह और शरद कुमार सिंह ने व्यास पीठ की आरती उतारी और श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया।