फागुन की मादक बयार, ढप-झांझ की थाप और रसिया पदों की गूंज के बीच नंदगांव एक बार फिर ब्रजरस में सराबोर हो उठा। अनुमति पा खुशहाल भये सब, पुरखा आनंदघन पौरन आए इन पंक्तियों के सजीव होते ही नंदभवन में ऐसा लगा मानो पुरखों की परंपरा स्वयं उतर आई हो। अबीर-गुलाल के बादल छाए, हर मूरत बहुरंगी हो उठी और बाबा आनंदघन वंशजों के चेहरे आनंद से दमक उठे।