भीलवाड़ा जिले में फुलिया कलां उपखंड क्षेत्र के धनोप गांव में मंगलवार को आयोजित दड़ा महोत्सव ने ग्रामीणों और दूरदराज से आए दर्शकों को रोमांचित कर दिया। यह पारंपरिक खेल बिना रेफरी के खेला जाता है और ग्रामीणों की आस्था और मनोरंजन का केंद्र बना रहता है।
महोत्सव का शुभारंभ धनोप मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष ठा. सत्येंद्र सिंह राणावत, जयेंद्र सिंह राणावत और भगवत सिंह राणावत ने पूजा-अर्चना से किया। इसके बाद पटेल महावीर गुर्जर ने सात किलो के दड़े को गढ़ से फेंककर खेल की शुरुआत की। दड़ा महोत्सव में दड़े को गांव की विभिन्न दिशाओं में फेंका जाता है। इस बार दड़ा सुनारों के घर तक ही पहुंचा और बालाजी मंदिर की ओर केवल एक बार गया। खेल मुख्य रूप से गढ़ चैक और सदर बाजार के बीच केंद्रित रहा।
ग्रामीणों का कहना है कि दड़े की दिशा से आगामी साल के मौसम और मिजाज का अंदाजा लगाया जाता है। इस बार का परिणाम सामान्य रहा। दोपहर चार बजे तक चले इस महोत्सव के दौरान गांव की बिजली और बाजार बंद रहे। खेल के समापन पर दड़े को फिर से गढ़ में सुरक्षित रख दिया गया, जिसे अगले साल मकर संक्रांति पर फिर से खेला जाएगा।
महोत्सव में हजारों ग्रामीणों और आगंतुकों ने हिस्सा लिया। खेल के दौरान ग्रामीणों ने पटेल की मौजूदगी में दड़े को गढ़ से निकालकर चैक तक लाया। जयकारों के बीच यह खेल दो घंटे तक चला। मनोरंजन के लिए बच्चों के लिए चकरी झूले लगाए गए और छतों पर खड़े दर्शकों ने ताने मार-मारकर खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाया।
महोत्सव के समापन पर गुड़ और अफीम का प्रसाद वितरित किया गया। गढ़ की ओर से गुड़ और पालीवाल बोहरा परिवार की ओर से अफीम का प्रसाद बांटा गया। ग्रामीणों ने इसे परंपरा का हिस्सा मानकर स्वीकार किया। महोत्सव के दौरान शांति बनाए रखने के लिए फुलिया कलां थाना पुलिस का जाब्ता तैनात रहा। आयोजन स्थल पर ग्राम पंचायत की ओर से खिलाड़ियों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त जगह पर बालू-मिट्टी डलवाई गई थी।
कोरोना काल में भी बना रहा था उत्साह
गौरतलब है कि साल 2022 में कोरोना महामारी के दौरान भी दड़ा महोत्सव आयोजित हुआ था। हालांकि, तब इसे बिना स्वीकृति के आयोजित करने पर ग्राम पंचायत ने 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था। साथ ही भीड़ एकत्रित होने के कारण तत्कालीन थानाधिकारी रामपाल बिश्नोई को लाइन हाजिर होना पड़ा था।
ग्रामीणों की आस्था का केंद्र
दड़ा महोत्सव धनोप गांव की एक प्राचीन और अनूठी परंपरा है। यह खेल न केवल ग्रामीणों की आस्था से जुड़ा है, बल्कि उनके मनोरंजन का भी प्रमुख साधन है। हर साल यह महोत्सव हजारों लोगों को आकर्षित करता है और धनोप की सांस्कृतिक धरोहर को संजोए रखता है।