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मैं मीरा सी

pragati gupta

Mere Alfaz
                                    
                     
                                                  मैं धूल बनी मैं खाक़ बनी
आखिर, मैं तेरी याद बनी,
नाम तेरा ही जप जप कर
मीरा सी देखो आज बनी,

कुछ छाँट-बांट ही डाला था
मेरी भक्ति से मेरे भावों को,
कलुषित कह कर बुद्धि मेरी
लगाई बेड़ियां मेरे पांवों को,

मुझे समझ ना पाया कोई
मेरा प्रेम एक अपवाद है,
कैसे समझे कोई मीरा को
जब राधा सबको याद हैं ,

मेरी अर्चना का भाग तुम
मेरे जीवन का सौभाग्य तुम,
मेरा प्रेम तुम से इतना ही
मेरी श्रद्धा तुम, आराध्य तुम,

एक प्रेम सरीखा भक्ति का
एक संयोग-वियोग श्रृंगार है
एक मीरा के रूप में
दूजा राधा सा मनोहार है।
- प्रगति

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4 वर्ष पहले
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