बाद-ए-नफ़रत
साहिब-ए-तख़्त हो गए।
खुशहाली,तरक्की,कारोबार की ख्वाहिश तो दूर
ये सियासत है।
बाद-ए-ख़िज़ाँ भी उम्मीद-ए- निजात मत रखना।