विज्ञापन

ओम निश्चल का गीत: तुम मन से कितने सुंदर हो

काव्य डेस्क

Kavita
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  तुम मन से कितने सुंदर हो
तुम तन से कितने पावन हो
है तुमसे
किसी जनम का
मेरा नाता बहुत सघन;
ओ, अनुरागी मन!
ओ, अनुरागी मन!!

तुमको  देखा  तो आंखों में
कुछ स्वर्णिम सपने तिर आए
सोचों में  सावन  झूम उठा
सांसों  में  बादल  घिर आए

नजरों से नजरें मिलीं
हृदय में जैसे खिला चमन।
ओ अनुरागी मन।

अनुभव की गहरी नदिया में
तुमने  गोते  खाए  होंगे
जीवन के समीकरण उलझे
कितने  ही  सुलझाए होंगे

अब एक पहेली सुलझा दो
क्यों भीगे हुए नयन?
ओ अनुरागी मन।

जिस पथ पर चल कर आए हो
जिस पथ से होकर जाना है
माना, मंजिल  है  दूर बहुत
पर तनिक नहीं  घबराना है

मेरे कांधे पर हाथ धरो
बस जाए नया भुवन।
ओ अनुरागी मन!
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Sanjay

2 कविताएं

View Profile

Sooba Lal

520 कविताएं

View Profile