राही मासूम रज़ा अपने समय के उम्दा शायर थे, मिशाल के ताैर पर ये ग़ज़ल है।गंगा-जमुनी तहज़ीब के पैरोकार इस शायर की शायरी में जीवन के कटु यथार्थों की झलक मिलती है।