लालू-नीतीश की दोस्ती को एक बार फिर से मजबूत करने में सोनिया गांधी ने कड़ी के रूप में काम किया ये सवाल खड़ा हो रहा है। सोनिया गांधी ही हैं, जिनकी बात लालू प्रसाद यादव नहीं टालते हैं... सोनिया से नीतीश कुमार के भी रिश्ते ठीक हैं... सूत्रों की माने तो नई सरकार को लेकर रविवार को नीतीश कुमार ने सोनिया गांधी से फोन पर बात की थी... ये माना जा रहा है कि सरकार बनाने को लेकर नीतीश की हिचकिचाहट को दूर करने में सोनिया ने भी अहम भूमिका निभाई है। हांलाकि इस बारे में दोनों ही तरफ से कोई औपचारिक बात तो नहीं कही गई लेकिन ये तो तय है कि सरकार में सहयोगी बदलने को लेकर नीतीश एक कशमकश के दौर से गुजरे होंगे। बीजेपी अब इसे विश्वासघात कह रही है लेकिन बीजेपी को बिहार में सत्ता से बाहर होना पड़ा है। महाराष्ट्र में बीजेपी की जीत का जश्न पूरा भी नहीं हुआ कि बिहार में बड़ा झटका लग गया।
कहा तो ये भी जा रहा था कि बातचीत इसलिए अटकी हुई थी क्योंकि राबड़ी देवी चाहती थी कि अगर सरकार बने तो सीएम तेजस्वी यादव बनें...इस बार सरकार बनाने में यही सबसे बड़ी अड़चन मानी जा रही थी लेकिन बीच का रास्ता निकल ही आया। ये बिना सहयोगियों और मध्यस्थता के संभव नहीं हो पाता है। बीजेपी के बढ़ते कद से नीतीश घबराए हुए थे और उन्हें अपनी पार्टी में भी शिवसेना जैसी फूट का डर सता रहा था लिहाजा उन्होंने बीजेपी के साथ रहने के बजाय बीजेपी के खिलाफ रहने में भलाई समझी। ऐसे में सोनिया गांधी ने उनका हौसला जरूर बढ़ाया होगा। बीजेपी कांग्रेस मुक्त भारत की बात तो कह ही चुकी थी अब क्षेत्रीय दलों पर दिए गए नड्डा के बयान ने भी कई सहयोगियों को निराश किया और नीतीश को तो डरा तक दिया कहना भी गलत नहीं होगा। कांग्रेस और सोनिया के लिए बीजेपी किसी खतरे से कम नहीं है ऐसे में खुद को बचाने के लिए सोनिया गांधी हर मुमकिन प्रयास कर रही हैं।
मीडिया खबरे तो ये भी रहीं कि आरसीपी सिंह के केंद्र में मंत्री का कार्यकाल खत्म होने से पहले भी उनके टॉप लीडरशीप की बात सोनिया गांधी से हुई थी और उसके बाद भी। हाल में उनकी बात सोनिया गांधी से हुई थी। सोनिया गांधी को इस बात के लिए मनाने की कोशिश की जा रही थी कि सोनिया गांधी, लालू प्रसाद को इस बात के लिए तैयार करें कि महागठबंधन की सरकार बने। नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बनें, अब सोनिया गांधी यह पहल की या नहीं कहना मुश्किल है लेकिन ये तो तय है कि उनकी मंशा यही रही होगी। लगातार झटके देने वाली बीजेपी को भी एक बड़ा झटका लग गया।
राबड़ी देवी जिद पर अड़ गई थी कि महागठबंधन का समर्थन चाहिए तो तेजस्वी को ही मुख्यमंत्री बनाना होगा। लेकिन उन्हें भी सत्ता में आने के लिए समझौता करना पड़ा। महाराष्ट्र का फडणवीस मॉडल भी दिमाग में रहा होगा। वहां सत्ता में आने के लिए कितना बड़ा समझौता बीजेपी ने किया है। तेजस्वी की ताकत तो पिछले विधानसभा चुनाव में ही देखने को मिल गई थी जब वो सबसे बड़े दल के तौर पर उभर कर आए थे। लेकिन विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने अपनी ताकत का अहसास करवाया। तेजस्वी यादव ने 7 अगस्त को पटना की सड़कों पर प्रतिरोध मार्च निकालकर अपनी ताकत का अहसास करा दिया था। उन्होंने महागठबंधन की पार्टी कांग्रेस को तो अपनी ताकत का अहसास कराया ही उससे अधिक जदयू को अपनी ताकत बताई थी।
बात लौटती है एक बार फिर लालू प्रसाद और सोनिया गांधी की तरफ कैसे पहले भी लालू ने सोनिया का साथ दिया था। दरअसल जब सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठा था उस समय लालू प्रसाद ऐसे बड़े नेता थे जिन्होंने भारतीय संस्कृति की व्याख्या की थी और सोनिया गांधी का साथ दिया था। ऐसे भी लालू प्रसाद और नीतीश कुमार में से ज्यादा बड़े सेक्यूलर नेता लालू प्रसाद को माना जाता है। बिहार विधान सभा चुनाव के बाद राजद और कांग्रेस के रिश्ते में खटास आई लेकिन कांग्रेस ने प्रतिरोध मार्च में हिस्सा लिया। इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव के समय भी कांग्रेस- राजद एक मंच पर यशवंत सिंहा के पक्ष में दिखे
बता दें कि बता दें कि बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में 243 सीटों में से नीतीश की पार्टी JDU ने 45 सीटों पर जीत हासिल की थी. जबकि BJP ने 77 सीटों पर विजय हासिल की थी. JDU के कम सीटें जीतने के बावजूद BJP ने नीतीश को मुख्यमंत्री बनाया था और प्रदेश की कामान उनको सौंपी थी. बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में राष्ट्रीय जनता दल ने 79 सीटें और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 19 सीटों पर जीत हासिल की थी. जबकि हम को 4 सीटें मिली थी.
बिहार की राजनीति में जबरदस्त बिखराव है। यहां कौन किसका दोस्त है कहना मुश्किल है लेकिन एक बात तो अब तय दिखाई दे रही है कि बीजेपी को अपने दम पर लड़ाई लड़नी होगी। सबसे बड़ी परेशानी ये कि अब विपक्ष पूरी तरह से 2024 के लिए लामबंद हो रहा है।