सैनिकों का गांव बरोदा राष्ट्रभक्ति का ऐसा उदाहरण है, जिसकी हर गली बलिदान की कहानियां सुनाती है। आजाद हिंद फौज से लेकर कारगिल की लड़ाई में इस गांव के वीरों ने अपने लहू से बलिदान का नया अध्याय लिखा है। इस गांव के युवाओं के लिए सेना की वर्दी महज एक नौकरी नहीं, पूर्वजों से मिली विरासत है। वर्तमान समय में भी बरोदा गांव के करीब 12 कैप्टन, 4 कर्नल और लगभग 100 जवान देश की सेवा में लगे हुए हैं। गांव के वीरों ने आजादी की लड़ाई में भी यहां के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। साल 1981 में सीआरपीएफ में तैनात इंस्पेक्टर बुधराम असम में उग्रवादियों के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो गए। इसके बाद 1998 के कारगिल युद्ध में 32 वर्षीय नायक सतबीर सिंह मोर ने भी दुश्मनों का मुकाबला करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उस समय उनके परिवार में पत्नी और दो बच्चे थे। साल 2003 में सूबेदार सत्यनारायण ने भी आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन के दौरान वीरगति पाई। वे बहुत ही जांबाज और फुर्तीले सैनिक थे, जिस कारण उन्हें ‘चीता’ के नाम से जाना जाता था। राज राइफल्स में रहते हुए उन्होंने कई सफल ऑपरेशन किए। वे एक अच्छे बॉक्सर भी रहे। खास बात यह रही कि उनकी बदली हो गई थी और अगली सुबह उनको दिल्ली जाने था, लेकिन उन्होंने रात में ही ऑपरेशन को अंजाम दिया और उसी दौरान देश के लिए शहीद हो गए। बरोदा गांव का यह इतिहास आज भी युवाओं को प्रेरित करता है। गांव के मैदानों और स्टेडियम में हर रोज युवा फौज, हरियाणा पुलिस, दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ, एयर फोर्स और नेवी में भर्ती होने के लिए कड़ी मेहनत करते नजर आते हैं। कुल मिलाकर बरोदा गांव देशभक्ति, बलिदान और मेहनत की मिसाल बना हुआ है, जहां का हर युवा देश की सेवा को अपना सबसे बड़ा सपना मानता है। आजाद हिंद फौज में बरोदा गांव के 10 सैनिक शामिल रहे। बताया जाता है कि ये सैनिक जापान की जेल में बंद थे, जहां से उन्हें सुभाष चंद्र बोस ने अपनी सेना में शामिल किया। इसके बाद इन फौजियों ने देश की आजादी की लड़ाई में अहम योगदान दिया। देश आजाद होने के बाद भी गांव के जवानों ने अपने साहस और बलिदान की मिसाल कायम रखी। 1962 के भारत-चीन युद्ध में गांव के कैप्टन जितेंद्र ने अपनी शहादत देकर गांव का नाम रोशन किया। उनके पिता लालचंद भी कर्नल पद से रिटायर हुए थे। कैप्टन जितेंद्र अपने परिवार के दो बेटों में से एक थे और महज 24 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए। उस समय वे अविवाहित थे। इसके बाद 1965 के भारत-पाक युद्ध में नायक सूबेदार धर्म सिंह ने भी वीरगति प्राप्त की। उस समय उनके परिवार में पत्नी छोटी देवी, लगभग साढ़े सात साल की बेटी, डेढ़ साल की छोटी बच्ची और साढ़े तीन साल का बेटा था। धर्म सिंह डोगरी क्षेत्र में तैनात थे और युद्ध के बाद गोला-बारूद इकट्ठा करते समय दुश्मन के विमान से गिराए गए बारूद की चपेट में आने से शहीद हो गए। इन दोनों शहीदों की याद में गांव के लोगों ने एक बड़ा फैसला लिया। पूरे गांव से चंदा इकट्ठा करके कैप्टन जितेंद्र और नायब सूबेदार धर्म सिंह के नाम पर सरकारी स्कूल की स्थापना की गई, जो आज भी उनके बलिदान की याद दिलाता है।