गांव पाली-जांट स्थित हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय पाली गांव की 488 एकड़ भूमि पर बना हुआ है, लेकिन गांव का नाम कहीं पर भी नहीं लिखा। ग्रामीणों को भी लंबे समय से जमीन देने के बावजूद भी रोजगार न मिलने का मलाल है। ग्रामीण विवि को महेंद्रगढ़ की बजाय जांट-पाली के नाम से जानने की मांग उठा रहे हैं। साथ ही लंबे समय में नौकरियों, पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए सीटें निर्धारित करने की भी मांग उठा रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए उन्होंने निशुल्क 488 एकड़ भूमि दी और तत्कालीन वीसी के साथ मौखिक रूप से ग्रुप डी की नौकरी पाली गांव के युवाओं देने का करार हुआ। विवि बनने पर कुछ युवाओं को रोजगार मिला, लेकिन जिस हद तक सहयोग होना चाहिए था, उस हद तक नहीं हो पाया। ग्रामीणों का कहना है कि पहले दोनों गांवों का नाम लिखा गया था, लेकिन विवि को सैंकड़ों एकड़ भूमि देने वाले पाली गांव की विश्वविद्यालय ने अनदेखी कर दी और कहीं पर भी गांव का नाम नहीं लिखवाया है। न ही विवि की ओर से कहीं रिकार्ड में गांव का नाम दिया जाता है। पाली ग्राम पंचायत ने विश्वविद्यालय स्थापना के लिए 488 एकड़ भूमि उपलब्ध कराई थी जबकि शेष भूमि जांट गांव की ओर से उपलब्ध कराई गई। इसके बावजूद विश्वविद्यालय के नाम या परिसर की पहचान में किसी भी गांव का नाम शामिल नहीं किया गया। यह मलाल लोगों में अब भी बरकरार है। ग्रामीणों का कहना है कि विश्वविद्यालय निर्माण के दौरान स्थानीय लोगों को मिला आश्वासन धरा रह गया है। संस्थान को डी-ग्रुप की नौकरियों में आसपास के गांवों के युवाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए थी, लेकिन विवि ने केवल बाहरी युवाओं को ही रोजगार दिया है। इससे गांव के युवा बेरोजगार हो गए हैं। स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की मांग तेज: ग्रामीणों ने बताया कि विश्वविद्यालय बनने से क्षेत्र के विकास और रोजगार की उम्मीदें जगी थी, लेकिन वर्षों बाद भी गांव के युवाओं को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया है। उनका कहना है कि योग्यता के अनुसार स्थानीय युवाओं को विश्वविद्यालय में रोजगार के अवसर मिलने चाहिए। गांव के नाम को पहचान दिलाने की मांग: ग्रामीणों ने मांग उठाई है कि विश्वविद्यालय परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार, किसी शैक्षणिक भवन या अन्य महत्वपूर्ण स्थल पर पाली और जांट गांव का नाम अंकित किया जाए। उनका कहना है कि जब विश्वविद्यालय की स्थापना में इन गांवों की भूमि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है तो उनकी पहचान को भी संरक्षित किया जाना चाहिए। जानिये गांव के लोगों का मलाल: पाली ग्राम पंचायत के सरपंच ने कहा गांव ने केंद्रीय विश्वविद्यालय के लिए 488 एकड़ भूमि दी थी। उस समय ग्रामीणों ने क्षेत्र के विकास और युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए यह बड़ा त्याग किया था, लेकिन आज गांव के नाम को नजरअंदाज कर दिया है। विश्वविद्यालय में पाली गांव का नाम जरूर आना चाहिए ताकि ग्राम पंचायत का सम्मान हो। साथ ही युवाओं को भी नौकरी के लिए अवसर देना चाहिए। देशराज सिंह फौजी, सरपंच, पाली विवि आने से गांव के लोगों की जमीन भी गई और युवाओं का रोजगार भी छीन गया है। किसी समय लोग पशुपालन व खेती करके जीवन निर्वाह कर लेते थे, लेकिन अब भी वह करने के लिए भी गांव में जगह नहीं है। शिक्षा व युवाओं के भविष्य के लिए जगह दी गई थी, लेकिन विवि ने गांवों का नाम व सम्मान मिटा दिया है। विवि को दोनों गांवों का हक फिर लौटाना चाहिए। --- सुरेंद्र सिंह, पूर्व सरपंच, पाली गांव को हक दिलाने के लिए वर्ष 2012 में 71 दिन का धरना दिया गया, लेकिन केवल आश्वासन देकर दोनों गांवों को दरकिनार कर दिया। अब करीब 10 साल में भर्ती टेंडर से दोनों गांवों का आरक्षण समाप्त कर दिया और बाहरी युवाओं को रोजगार देकर विवि काम साध रहा है। केंद्र सरकार को इस पर संज्ञान लेकर पहले वाले रूल लागू करने चाहिए ताकि गांवों को सम्मान व युवाओं को रोजगार मिल सके। अन्यथा दोनों ग्राम पंचायतों को एकजुटता दिखाकर हक लेना चाहिए। --- कैलाश पाली, ग्रामीण अगर युवाओं को रोजगार मिले तो गांव में युवा बेरोजगार नहीं होंगे। साथ ही अन्य क्षेत्र के लोगों को रोजगार देना पाली गांव के साथ धोखा है। टेंडर से गांव का आरक्षण हटाना बिल्कुल गलत है और विवि प्रशासन को फिर से इसे लागू करना चाहिए। विवि को ग्राम पंचायत ने जमीन दी है तो विवि में ग्रामीणों को रोजगार मिलना चाहिए। साथ ही जिस गांव में विवि स्थापित है उनको ही अनदेखा कर विवि प्रशासन पंचायतों की तोहिद कर रहा है। ---- सुबोध, ग्रामीण