झांसी। गद्य के साथ पद्य का प्रयोग करके हिंदी नाटक लेखन को पं. गणेश प्रसाद द्विवेदी ने एक नया आयाम दिया। उनके नाटकों की कथावस्तु बुंदेलखंड की ऐतिहासिक गाथाओं पर आधारित रही । उनके नाटकों में जिस तरह से खड़ी बोली के कवित्तों का प्रयोग किया गया है उससे श्रव्य काव्य आम आदमी के लिए दृश्य काव्य बनकर लोक प्रचलित हो गया। इनके लेखन में डा. वृंदावन लाल वर्मा की छाप दिखाई देती है। वर्मा जी ने जहां झांसी की रानी, विराटा की पद्मिनी, गढ़कुंडार जैसे उपन्यासों की रचना कर बुंदेलखंड की ऐतिहासिक कथाओं को आमजन तक पहुंचाया तो वहीं पं. गणेश प्रसाद ने ओरछा की रानी, वीर हरदौल, महाकवि केशव जैसे नाटकों की रचना करके यहां की ऐतिहासिक, धार्मिक लोककथाओं को जन जन तक पहुंचाया। बुंदेलखंड के बुंदेला राजकुमार वीर हरदौल पर लिखा गया नाटक लाल हरदौल बुंदेलखंड में बेहद लोकप्रिय रहा, जिस दौर में टीवी और इंटरनेट जैसे साधन नहीं थे उस समय सिर्फ मंच पर होने वाले नाटक ही लोगों के मनोरंजन का साधन थे। बुंदेलखंड के रंगकर्मियों के बीच इस नाटक का अनेक मंचों पर मंचन किया गया। इसके संवादों में गद्य और पद्य का एक साथ होना हिंदी साहित्य में एक अनूठा प्रयाग है। पं. गणेश प्रसाद ने ऐतिहासिक नाटकों के साथ अपने कविता संग्रहों में राष्ट्रभक्ति और सामाजिक समस्याओं पर भी चोट की है। जमींदारी प्रथा के खिलाफ उनकी बुंदेली कविताएं काफी लोकप्रिय रहीं।
गणेश प्रसाद के साहित्य में बुंदेली लोकजीवन की झलक
रिछारिया महाविद्यालय को प्राचार्य डा. जेपीएन मिश्रा बताते हैं कि बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले में जन्मे गणेश प्रसाद द्विवेदी के साहित्य में लोकजीवन की झलक दिखाई देती है। उनकी कथावस्तु में बुंदेलखंड की माटी की सुगंध है। यह बात अलहदा है कि उनकी अधिकांश रचनाएं खड़ी बोली में ही हैं पर उनके पात्र और कहानी का तानाबाना बुंदेली लोकजीवन से जुड़ा है। पं. गणेश प्रसाद द्वारा लिखे गए वीर हरदौल नाटक में एक कवित्त है, इसमें बुंदेला राजा जुझार सिंह अपनी महारानी को हरदौल को विष देने का आदेश देते हैं, इसमें उन्होंने बुंदेली व्यंजनों के साथ विष मिलाने विधि और स्वरूपों का वर्णन किया है। गणेश प्रसाद जी ने लिखा है, पेड़ा रसगुल्ला इमरती गुलकंद सेव, बरफी और हलुआ में हरदिया हिलाइयो। लड्डू में जलेबी में पापड़ तिलपपड़ी में, मगद और मालपुआ माहुर मिलाइयो। करियो तैयार, कढ़ी देवलन की दार साग, आलू संग पूड़ी में पन्नगी पिलाइयो। चटनी पौदीना अचार कैथ नीबू में ,साथ गंगाजल में गरल गिराइयो। इस नाटक का हर पात्र अपने आप में सशक्त है। बिलाप करती महारानी को रियासत की नाइन जिस अंदाज के संवादों में समझाती है उसे देखकर दर्शकों को कुछ देर के लिए भ्रम हो जाता है कि शायद हरदौल का विषपान महाराजा को नाइन के समझाने पर टल जाएगा पर ऐसा होता नहीं है। नाटक में बेहद उतारचढ़ाव हैं। गणेश प्रसाद के अधिकांश नाटक सोलहवीं सदी की ऐतिहासिक कथाओं को केंद्र बनाकर लिखे गए हैं। इनमें ओरछा की रानी, महाकवि केशव, ओरछा के नूपुर नाटकों के अलावा, हरदौल चरित्र काव्य भी लिखा गया। बुंदेली भाषा में बुंदेली चौकड़िया भी उन्होंने लिखीं हैं।
पी लओ पी लओ रे कन्हैया ने दूध बछेरू बनके गइया को
इतिहास के प्रवक्ता डा. शशिशेखर का कहना है पं. गणेश प्रसाद के खड़ी बोली मे लिखे गए साहित्य को अधिकांश लोग जानते हैं पर यह बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका बुंदेली भाषा पर भी उतना ही अच्छा काम था जितना कि हिंदी पर। बुंदेली में लिखा गया यह धार्मिक भजन आज भी मंदिरों में सुनाई दे जाता है, पी लओ पी लओ रे कन्हैया ने दूध, बछेरू बनके गइया कौ। इसमें उन्होंने बालकृष्ण का सुंदर चित्र खींचा है, इसमें लिखा है कि कृष्ण जी बछड़ा बनकर गाय का दूध पी रहे हैं। इतना ही नहीं जमींदारी प्रथा के खिलाफ उनकी बुंदेली में लिखी गई कविता मौखौं मुखिया ने करो री हैरान, जिजी रामधई बैन तोई सौ मैं न जैहों बाके द्वारे पै। जमीदारों के शोषण और महिलाओं के उत्पीड़न की कहानी को उजागर करती है। इसी तरह उन्होंने एक दलित वर्ग के बालक की व्यथा को स्कूल जाने की घटना से जोड़कर सामंती व्यवस्था पर करारी चोट की है।