आगरा के कोठी मीना बाजार की 300 करोड़ रुपये कीमत की 30 बीघा निष्क्रांत संपत्ति के मामले में हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी, एडीएम वित्त, एसडीएम सदर और तहसीलदार को नोटिस जारी किए हैं। जमीन पर कब्जे को लेकर पाठक वृंदावन ट्रस्ट ने प्रशासन के विरुद्ध अवमानना याचिका दायर की थी। जिसकी सुनवाई के बाद कोर्ट ने अफसरों को शपथ पत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
मौजा खतैना के गाटा संख्या 560 में कोठी मीना बाजार है। यह करीब 57 बीघा जमीन हैं। इसमें से 27 बीघा निजी भूमि है। जिसमें दो बीघा का कब्रिस्तान भी है। शेष 30 बीघा जमीन राजस्व रिकार्ड में निष्क्रांत संपत्ति है। जो 1947 मे हुए बंटवारे के बाद भारत सरकार के हिस्से में आई।
इसी जमीन पर पाठक वृंदावन ट्रस्ट और प्रशासन के बीच 30 साल से विवाद चल रहा है। वर्ष 2003 में ट्रस्ट ने भूमि पर निर्माण करना चाहा लेकिन प्रशासन ने रोक दिया। जिसके बाद ट्रस्ट ने अवमानना याचिका दायर की। प्रकरण में 13 मई, 2021 को हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों को नोटिस जारी किए हैं। एडीएम वित्त एवं राजस्व योगेंद्र कुमार का कहना है कि बेशकीमती सरकारी जमीन को ट्रस्ट हड़पना चाहता है। नोटिस का जवाब भेजा है। जमीन की वास्तविक स्थिति पता करने के लिए टोटल स्टेशन मशीन से सर्वे कराया जाएगा। प्रशासन की तरफ से मुकदमे में पैरवी होगी।
1892 में लीज पर मिली थी कोठी
राजा जयकिशन दास, मैसर्स जेआर रीड और तत्कालीन सदस्य राजस्व बोर्ड डब्ल्यूमाया और पाठक वृंदावन ट्रस्ट के बीच 15 सितंबर, 1892 में 14 हजार रुपये में कोठी का एग्रीमेंट हुआ। 6 मार्च, 1902 को एग्रीमेंट के आधार पर ट्रस्ट ने जमीन पर दावा प्रस्तुत किया। एग्रीमेंट में खसरा नंबर, क्षेत्रफल व दिशाएं अंकित नहीं होने से प्रशासन ने इसे शून्य माना। फिर 15 दिसंबर, 1949 को कस्टोडियन के आदेश पर संपत्ति निष्क्रांत घोषित हो गई। ट्रस्ट ने भूमि पर दावा किया और मामला पहली बार सिविल न्यायालय में पहुंचा। 14 मई, 1957 को ट्रस्ट की आपत्ति और दावे को न्यायालय सहायक कस्टोडियन ने निरस्त करते हुए एग्रीमेंट को आदेश में गैरकानूनी बताया था।
वर्ष 1990 में दिया बेदखल नहीं करने का आदेश
एग्रीमेंट निरस्त करने पर ट्रस्ट ने 10 अप्रैल, 1990 को सिविल रिट हाईकोर्ट में दायर की। हाईकोर्ट ने ट्रस्ट को कोठी मीना बाजार से बेदखल नहीं करने और इस याचिका को दीवानी में व्यवहार वाद के रूप में दाखिल करने के आदेश दिए। ट्रस्ट ने दीवानी में कोई वाद दायर नहीं किया। अपील 408/1993 में तत्कालीन प्रथम अतिरिक्त जिला जज ने ट्रस्ट के पक्ष में 12 मई, 1994 में निर्णय देते हुए उक्त भूमि पर ट्रस्ट का स्वामित्व निर्धारित कर दिया।
10 साल तक नहीं कर पाए अपील
वर्ष 1994 में सिविल न्यायालय की ओर से ट्रस्ट का स्वामित्व निर्धारित करने के बाद राज्य सरकार की तरफ से पैरवी नहीं हो सकी। दस साल बाद वर्ष 2004 में शासन से स्वामित्व निर्धारण के निर्णय के विरुद्ध अपील की अनुमति मिली। जब मुख्य स्थायी अधिवक्ता शिवनाथ सिंह से संपर्क किया तो उन्होंने अवगत कराया कि उक्त प्रकरण में इतनी लंबी अवधि बाद रिट दाखिल करने से राज्य सरकार को फायदा नहीं होगा। जिसके बाद आज तक रिट दाखिल नहीं हो सकी।
वर्ष 2004 में हुए दोबारा बहस के आदेश
रिट पिटीशन 12756/1997 का निस्तारण करते हुए राजस्व परिषद के सदस्य टी जॉर्ज थॉमस ने 24 अगस्त, 2004 को बार-बार न्यायालय में याचिका दायर करने की जगह मुख्य बिंदुओं पर दोबारा बहस के आदेश दिए। परंतु उक्त आदेश के विरुद्ध ट्रस्ट ने लखनऊ बैंच में रिवीजन रिट दाखिल की। जिसे वर्ष 2017 में अदम पैरवी न्यायालय ने खारिज कर दिया।
देरी माफ के साथ प्रस्तुत किया है जवाब
हाईकोर्ट में देरी के लिए माफी मांगते हुए जवाब प्रस्तुत किया है। पूरे मामले में वर्ष 1892 तक का रिकार्ड खंगाला है। नोटिस के जवाब कोर्ट को भेज दिए हैं। राजस्व रिकार्ड में जमीन निष्क्रांत संपत्ति है।
-योगेंद्र कुमार, एडीएम वित्त एवं राजस्व
दोबारा करा रहे है सर्वे
गाटा संख्या 560 की जमीन की वास्तविक स्थिति पता करने के लिए टोटल स्टेशन मशीन से सर्वे के आदेश एसडीएम को दिए हैं। सरकारी जमीन को हड़पने की साजिश की गई है।
- प्रभु एन सिंह, जिलाधिकारी
मां-बच्चों की हत्या का खुलासा: कर्ज की रकम का तगादा करने से नाखुश था संतोष, ऐसे दिया सनसनीखेज हत्याकांड को अंजाम