जीवन और मृत्यु,
नदी के दो किनारे,
बीच में बहती,
मोह माया की प्यास,
मिलकर होता एहसास
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एक अनजान मिलन की आहट,
जीवन की आपाधापी में,
बिसरे हर मोहक गीत,
नहीं की मृत्यु की प्रतीक्षा,
न की उस नितांत अजनबी से
मिलने की आस
कितने अधूरे स्वप्न रहे
कितनी कविताओं में शब्द नहीं जड़े,
कितने दृश्य रंग बिना सूने रहे,
जीवन में कई कष्टों ने घेरा
हे मृत्यु ! कर लो अब आलिंगन,
मिल जाऊं तुमसे देकर अपने,
सारे स्वप्न इस धरा को,
हो जाऊं अमर मैं,
इतिहास के पन्नों पर,
नाम औक तारीख़ बनकर.....