बदन तो है मिट्टी का हिस्सा दिक़्क़त ये है
तेज़ है बारिश घर है कच्चा दिक़्क़त ये है।
तेज़ आँधियाँ उमड़ रही हैं सर के ऊपर,
सहराओं के बीच है रस्ता दिक़्क़त ये है।
घेरे मुझको खड़े हुए दुश्मन के जत्थे,
और युद्ध में हूँ मैं निहत्था दिक़्क़त ये है।
किरदारों के दिल के फ़ासले बढ़ने लगे हैं,
और ख़त्म होने को क़िस्सा दिक़्क़त ये है।
अपने दिल की फ़ितरत में है सिर्फ़ वफ़ाएँ,
उसका दिल है चोर उच्चका दिक़्क़त ये है।
मिलना झुलना तेज़ हवाओं से है उसका,
मैं हूँ डाल का सूखा पत्ता दिक़्क़त ये है।
आग हवा मिट्टी और पानी के वज़ूद में,
जिस्म है मेरा जैसे हुक़्क़ा दिक़्क़त ये है।
~ सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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