मैंने नहीं जानी
परवाह से इतर प्रेम की परिभाषा
मैं नहीं जानती
प्रेम की बातों का शब्दकोष, व्याकरण
या कि इतिहास
मैं सिर्फ इतना ही कर पाई
कि महफूज़ रखा तुम्हारा विश्वास
अपनी ओढ़नी की गाँठ में
अब कहीं गिरेगा नहीं
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मैंने रख दिए तुम्हारे सपने
दुआओं की संदूक में
तकदीर की लकीरों से फिसलकर
अब वे टूटेंगे नहीं
मैंने नहीं माँगा प्रतिदान तुमसे
लेकिन फिर भी
तुम्हारा वापस ना आना
मुझे खलेगा |
साभार: दीप्ति पाण्डेय की फेसबुक वाल से