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Social Media Poetry: खामोशी जो दिल में दबी थी कहीं

काव्य डेस्क

Viral Kavya
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                            इस कदर उसकी याद सताने लगी,
        
                                                    
                            
वो सपनों में हूर बनकर आने लगी।

ये तो उसका एहसान था मुझ पर,
कि वो मुझे देख कर मुस्कुराने लगी।

खामोशी जो दिल में दबी थी कहीं,
वो अब बातों-बातों में अधरों पर आने लगी।

वो जो कल तक अनजान सी लगती थी,
अब रग-रग में लहू बन के समाने लगी।

राकेश, उसकी सादगी का ये आलम तो देखो,
कि वो अब पत्थर को भी इंसान बनाने लगी।

~राकेश धर द्विवेदी 

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