विज्ञापन

Social Media Poetry: मेरी अपराधिन आँखों ने फिर से एक सपन देखा है !

काव्य डेस्क

Viral Kavya
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            मेरी अपराधिन आँखों ने फिर से एक सपन देखा है !
        
                                                    
                            
इच्छाओं  की  वैदेही  ने  वन  में स्वर्ण हिरन देखा है !

उसको  कोई क्या बतलाये 
किस बिरवे के कैसे फल हैं
शबरी  ने  सारे  बेरों  का  खट्टा - मीठापन  देखा  है !

वन्दनवार  अभी  मत बाँधो
अब  जाने  क्या ही होना  है
मन के दसरथ ने फिर जाकर हठ का कोपभवन देखा है 

कुटियों का विनाश करने से
पहले  यह  भी  सोचा जाये
प्रायः  सोने  की  लंकाओं  ने  भीषण  क्रन्दन  देखा  है !

सारी  अवधपुरी  हर्षित  है 
पुष्पक  उतरा है  आँगन में 
उस उस को सब देख रहे हैं जिस जिस ने रावन देखा है !

साभार: ज्ञानप्रकाश आकुल की फेसबुक वाल से 
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all