वो प्रतिपल रूप बदलता है,
थिरकते बादल में वो कौन?
है कितना चारु,चपल,गतिमान,
छुपा सा नृत्य प्रदर्शित मौन।।
वो गर्जन सम की थाप लिए,
राग मल्हार हुआ साकार ।
निहारूं,चकित,भ्रमित,विस्मित,
धरा का नव आकार प्रकार ।।
विज्ञापन
ये बूंदें निराकार, निर्वर्ण,
किंतु हैं सप्तरंग छविमान।
हैं बिखरे स्वप्निल रंग सभी,
हुए मन,नयन पूर्ण अभिराम।।
घुमड़ते बादल की यह रीत,
कि ज्यों प्रिय-विरह-विधुर की प्रीत।
बरस कर तड़प-तड़प कर ज्यों,
तड़ित् से प्रणयन करते गीत।।
सरस संपृक्त हुई वसुधा,
हुआ विभोर-मोर सा मन,
कि जब भी भींगे तन, मन भी
हृदय में नूपुर सी छन -छन।।
अचानक कैसे तीव्र हुआ?
वह उत्सुक केका का कूजन।
कि प्रिय का स्मरण बना समिधा,
हुआ मन मंदिर में पूजन।।
वह देखो देखो न ! छिपते से,
कैसे अनुपम हरिण युगल?
श्याम बादल बरसा उन पर,
नयन,तन,मन को कर चंचल।।
छिटकते जल कि वे बूंदें,
जो देते हैं एक दूजे पर।
कि जायें भला जिधर भी वे,
परस्पर हुए रंग, रस, सम।।
कि आओ पल भर को विचरें,
कभी हम भी यूं ही संग-संग।
है धरती हरी, भरी, धानी,
गगन के मेघ सघन उन्मन।।
खिला है तम 'पर्जन्यों' का,
कि जैसे सांझ हुई दिन में।
विहंसते स्वप्न सकल जग के,
कृष्ण वंशी के मधुस्वन में।।
- डॉ श्रुति मिश्रा