भीषण भूख और अकाल के दिनों में
जब सारा सब्र खा कर ख़त्म कर दिया था मैंने
और अब देह ही थी, देह को जीवित रखने के लिए
मैंने सबसे आख़री में अपना हृदय चबाया
सबसे पहले आँखें खाई
बीच में क्या क्या खाया उसका हिसाब नहीं
धोका खाया
आँसू पिये
गुस्सा थूका
नाख़ून चबाए
और इस तरह मैं पूर्णयता स्वयं के लिए स्वयं पर आश्रित था
अपने पैरों पर खड़ा था
मेरे हाँथों में उतरे थे जगन्नाथ
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घुटनों के बीच सिर दिए
नज़रें झुका कर जब मैं अपना हृदय कुतर रहा था
स्मृतियों में किसी नदी के पाँव में पड़ा था कोई तीर
ईश्वर रोया था या हँसा था
ये अगले जन्म में पता चलेगा
तो हृदय चबाते हुए तुम दूर से देख रही थी मुझे
सुर्ख लाल साड़ी में
शादी के जोड़े में
शहनाई की धुन पर तिरती हुई पहुंचीं थी तुम यहाँ तक
इस तरह देखा था तुमने मुझे
जैसे कोई स्त्री परपुरुष को देखती है
मेरे पश्चिम में उगा था एक अभागा चाँद
मेरे पूरब में मर गया था एक सूर्य
नितांत व्यक्तिगत रही तुम्हारी ये हिंसा
इतनी व्यक्तिगत कि मैंने कभी खुद को भी नहीं बताया इस हिंसा के बारे में
मैंने कहा मृत्यु जीवन का सत्य है
और हत्यारे सत्य के रक्षक
तुम मेरे जीवन का सत्य भी थी
और मेरे सत्य की रक्षक थी
जिस शाम तुम्हारी उँगली छूटी मेरे हाँथों से
गंगा में सैकड़ों दीप अपना रास्ता भूल गए
गंगा की धार पर बहते हुए दीपकों का भटक जाना कैसा होता है
सिर्फ मैं जानता हूँ
~अनुराग अनंत