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ज़फ़र इक़बाल की ग़ज़ल: चलो इतनी तो आसानी रहेगी

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  चलो इतनी तो आसानी रहेगी 
मिलेंगे और परेशानी रहेगी 

इसी से रौनक़-ए-दरिया-ए-दिल है 
यही इक लहर तूफ़ानी रहेगी 

कभी ये शौक़ ना-मानूस होगा 
कभी वो शक्ल अनजानी रहेगी 

निकल जाएगी सूरत आइने से 
हमारे घर में हैरानी रहेगी 

सुबुक-सर हो के जीना है कोई दिन 
अभी कुछ दिन गिराँ-जानी रहेगी 

सुनोगे लफ़्ज़ में भी फड़फड़ाहट 
लहू में भी पर-अफ़्शानी रहेगी 
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हमारी गर्म-गुफ़्तारी के बा-वस्फ़ 
हवा इतनी ही बर्फ़ानी रहेगी 

अभी दिल की सियाही ज़ोर पर है 
अभी चेहरे पे ताबानी रहेगी 

'ज़फ़र' मैं शहर में आ तो गया हूँ 
मिरी ख़सलत बयाबानी रहेगी 
2 वर्ष पहले
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