रात जब भी उदास होती है
वो मिरे आस-पास होती है
जिस के मिलने से कुछ नहीं मिलता
उस को पाने की आस होती है
तीरगी ज़ब्त आज़माती है
रौशनी ग़म-शनास होती है
अब उसे हो सितम से क्यों परहेज़
'आशिक़ी बद-हवास होती है
ख़्वाब में जब भी तुम से मिलता हूँ
नींद में इक मिठास होती है
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