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Urdu Poetry: डर मुझे भी लगता है कम-नज़र ज़माने से

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            डर मुझे भी लगता है कम-नज़र ज़माने से
        
                                                    
                            
क्या करूँ न माने जब दिल मिरा मनाने से

जल उठा था पल भर को आप की इनायत से
बुझ गया चराग़-ए-दिल आप के बुझाने से

वो तो ला-उबाली है क्या उसे ख़बर होगी
हम पे क्या गुज़रती है हाल-ए-दिल छुपाने से

बरहमी में चेहरे को क्यूँ बिगाड़ रक्खा है
ये हसीन लगता है सिर्फ़ मुस्कुराने से

बाम-ओ-दर मिरे घर के मुंतज़िर हैं उस दिन के
जब तुम्हें मिले फ़ुर्सत महफ़िलों में जाने से

हम वफ़ा के मतवाले जान को नहीं डरते
बाज़ अब तो आ जाओ हम को आज़माने से

दर्स जाँ-निसारी का तू हमें न दे 'तश्ना'
क्या मिला तुझे अब तक ज़िंदगी लुटाने से

~ तशना आज़मी

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एक महीने पहले
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