ख़ुद ही प्यासे हैं समुंदर तो फ़क़त नाम के हैं
भूल जाओ कि बड़े लोग किसी काम के हैं
दस्तकें ख़ास उसी वक़्त में देता है कोई
चार छे पल जो मिरी उम्र में आराम के हैं
कोई क्या लाग लगाए कि बिछड़ना है अभी
हम-सफ़र आप के हम एक ही दो गाम के हैं
आसमानों की बुलंदी का सफ़र तय कर के
लौट आते हैं परिंदे जो मिरे बाम के हैं
शायरी चाय तिरी याद चमकते जुगनू
बस यही चार तलब रोज़ मिरी शाम के हैं
~ संजू शब्दिता
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