विज्ञापन

साबिर वसीम की ग़ज़ल: दरिया उस को रस्ता दे कर आज तलक पछताता है

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है 
दरिया उस को रस्ता दे कर आज तलक पछताता है 

जंगल जंगल घूमने वाला अपने ध्यान की दस्तक से 
कोसों दूर इक घर में किसी को सारी रात जगाता है 

जाने किस की आस लगी है जाने किस को आना है 
कोई रेल की सीटी सुन कर सोते से उठ जाता है 

मेरी गली के सामने वाले घर की अँधेरी खिड़की में 
उस लड़की से बातें कर के कोई मुझे दोहराता है 
विज्ञापन

कैसा झूटा सहारा है ये दुख से आँख चुराने का 
कोई किसी का हाल सुना कर अपना-आप छुपाता है 

कच्ची मुंडेरों वाले घर में शाम के ढलते ही हर रोज़ 
अपने दुपट्टे के पल्लू से कोई चराग़ जलाता है 
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

kamlesh ranjan

1 कविता

View Profile