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Urdu Ghazals: राजेश रेड्डी की 3 चुनिंदा ग़ज़लें

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  1-

कितनी आसानी से दुनिया की गिरह खोलता है
मुझ में इक बच्चा बुज़ुर्गों की तरह बोलता है

क्या अजब है कि उड़ाता है कबूतर पहले
फिर फ़ज़ाओं में वो बारूद की बू घोलता है

रूप कितने ही भरें कितने ही चेहरे बदलें
आईना आप को अपनी ही तरह तौलता है

सोच लो कल कहीं आँसू न बहाने पड़ जाएँ
ख़ून का क्या है रगों में वो यूँही खौलता है

हाथ उठाता है दुआओं को फ़लक भी उस दम
जब परिंदा कोई परवाज़ को पर तौलता है

कौन वाक़िफ़ नहीं संसार के सच से लेकिन
सब का संसार की हर चीज़ पे मन डोलता है

2-
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सुना है ये जहाँ अच्छा था पहले

सुना है ये जहाँ अच्छा था पहले
ये जो अब दश्त है दरिया था पहले

जो होता कौन आता इस जहाँ में
किसे दुनिया का अंदाज़ा था पहले

बड़ी तस्वीर लटका दी है अपनी
जहाँ छोटा सा आईना था पहले

समझ में कुछ नहीं आता अब उस की
वो जो औरों को समझाता था पहले

किया ईजाद जिस ने भी ख़ुदा को
वो ख़ुद को कैसे बहलाता था पहले

बहुत कुछ भी नहीं काफ़ी यहाँ अब
बहुत थोड़े से चल जाता था पहले

ये दीवारें तो हैं इस दौर का सच
खुला हर दिल का दरवाज़ा था पहले

3- 

दरवाज़े के अंदर इक दरवाज़ा और

दरवाज़े के अंदर इक दरवाज़ा और
छुपा हुआ है मुझ में जाने क्या क्या और

कोई अंत नहीं मन के सूने-पन का
सन्नाटे के पार है इक सन्नाटा और

कभी तो लगता है जितना है काफ़ी है
और कभी लगता है और ज़रा सा और

सच कहने पर ख़ुश होना तो दूर रहा
किया ज़माने ने मुझ को शर्मिंदा और

अजब मुसाफ़िर हूँ मैं मेरा सफ़र अजीब
मेरी मंज़िल और है मेरा रस्ता और

औरों जैसे और न जाने कितने हैं
कोई कहाँ है लेकिन मेरे जैसा और

एक वर्ष पहले
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