विज्ञापन

Nasir Kazmi: नासिर काज़मी की ग़ज़ल 'होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी'

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी


बरहम हुई है यूँ भी तबीअत कभी कभी

ऐ दिल किसे नसीब ये तौफ़ीक़-ए-इज़्तिराब
मिलती है ज़िंदगी में ये राहत कभी कभी

तेरे करम से ऐ अलम-ए-हुस्न-आफ़रीं
दिल बन गया है दोस्त की ख़ल्वत कभी कभी

जोश-ए-जुनूँ में दर्द की तुग़्यानियों के साथ
अश्कों में ढल गई तिरी सूरत कभी कभी

तेरे क़रीब रह के भी दिल मुतमइन न था
गुज़री है मुझ पे ये भी क़यामत कभी कभी

कुछ अपना होश था न तुम्हारा ख़याल था
यूँ भी गुज़र गई शब-ए-फ़ुर्क़त कभी कभी

ऐ दोस्त हम ने तर्क-ए-मोहब्बत के बावजूद
महसूस की है तेरी ज़रूरत कभी कभी
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

User

26 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12570 कविताएं

View Profile

Sudhir Khatri

562 कविताएं

View Profile