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मुज़्तर आज़मी: अँधेरी रात में ख़ुद को जला के देखते हैं

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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अँधेरी रात में ख़ुद को जला के देखते हैं
नए चराग़ हैं तेवर हवा के देखते हैं

सितारे दूर से उन को नज़र नहीं आते
हर एक शय को वो नज़दीक जा के देखते हैं

मिरा वुजूद है शफ़्फ़ाफ़ आइने की तरह
वो देखते हैं तो चश्मा लगा के देखते हैं

किसी के 'इश्क़ में मिट जाना भी 'इबादत है
ये बात सच है तो ख़ुद को मिटा के देखते हैं

मिरे ख़ुलूस पे उन को यक़ीं नहीं शायद
वो सब के सामने मुझ को बुला के देखते हैं

दवा से जो न हुआ काम वो दु'आ ने किया
दवा के मारे करिश्मे दु'आ के देखते हैं

कई दिनों से फ़ज़ाएँ उदास हैं 'मुज़्तर'
चलो लिबास में ख़ुशबू लगा के देखते हैं हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

3 दिन पहले
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