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मुबारक अज़ीमाबादी: चुनिंदा शेर

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  मुझ को मालूम है अंजाम-ए-मोहब्बत क्या है 
एक दिन मौत की उम्मीद पे जीना होगा 

तेरी बख़्शिश के भरोसे पे ख़ताएँ की हैं 
तेरी रहमत के सहारे ने गुनहगार किया 
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तिरी अदा की क़सम है तिरी अदा के सिवा 
पसंद और किसी की हमें अदा न हुई 

अपनी सी करो तुम भी अपनी सी करें हम भी 
कुछ तुम ने भी ठानी है कुछ हम ने भी ठानी है 

कहीं ऐसा न हो कम-बख़्त में जान आ जाए 
इस लिए हाथ में लेते मिरी तस्वीर नहीं 

दिल लगाते ही तो कह देती हैं आँखें सब कुछ 
ऐसे कामों के भी आग़ाज़ कहीं छुपते हैं 

कब वो आएँगे इलाही मिरे मेहमाँ हो कर 
कौन दिन कौन बरस कौन महीना होगा 

उधर चुटकी वो दिल में ले रहे हैं 
इधर इक गुदगुदी सी हो रही है 
 

क्या कहें क्या क्या किया तेरी निगाहों ने सुलूक 
दिल में आईं दिल में ठहरीं दिल में पैकाँ हो गईं 

बिखरी हुई है यूँ मिरी वहशत की दास्ताँ 
दामन किधर किधर है गिरेबाँ कहाँ कहाँ 
4 वर्ष पहले
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Bajrang Lal

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