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मोमिन ख़ाँ मोमिन: असर उस को ज़रा नहीं होता

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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असर उस को ज़रा नहीं होता
रंज राहत-फ़ज़ा नहीं होता

बेवफ़ा कहने की शिकायत है
तो भी वादा-वफ़ा नहीं होता

ज़िक्र-ए-अग़्यार से हुआ मा'लूम
हर्फ़-ए-नासेह बुरा नहीं होता

किस को है ज़ौक़-ए-तल्ख़-कामी लेक
जंग बिन कुछ मज़ा नहीं होता

तुम हमारे किसी तरह न हुए
वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता

उस ने क्या जाने क्या किया ले कर
दिल किसी काम का नहीं होता

इम्तिहाँ कीजिए मिरा जब तक
शौक़ ज़ोर-आज़मा नहीं होता

एक दुश्मन कि चर्ख़ है न रहे
तुझ से ये ऐ दुआ नहीं होता

आह तूल-ए-अमल है रोज़-फ़ुज़ूँ
गरचे इक मुद्दआ नहीं होता

तुम मिरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता

हाल-ए-दिल यार को लिखूँ क्यूँकर
हाथ दिल से जुदा नहीं होता

रहम कर ख़स्म-ए-जान-ए-ग़ैर न हो
सब का दिल एक सा नहीं होता

दामन उस का जो है दराज़ तो हो
दस्त-ए-आशिक़ रसा नहीं होता

चारा-ए-दिल सिवाए सब्र नहीं
सो तुम्हारे सिवा नहीं होता

क्यूँ सुने अर्ज़-ए-मुज़्तर-ए-'मोमिन'
सनम आख़िर ख़ुदा नहीं होता
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