विज्ञापन

Kaifi Azmi Poetry: बिछड़ के उन से सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            

जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा
बिछड़ के उन से सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा

लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उस का
सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा

गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे
ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा 

2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all