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Urdu Ghazal: जाँ निसार अख़्तर की 3 बेहतरीन ग़ज़लें

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  1-

सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी
तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी

उन से यही कह आएँ कि अब हम न मिलेंगे
आख़िर कोई तक़रीब-ए-मुलाक़ात बनेगी

ऐ नावक-ए-ग़म दिल में है इक बूँद लहू की
कुछ और तो क्या हम से मुदारात बनेगी

ये हम से न होगा कि किसी एक को चाहें
ऐ इश्क़ हमारी न तिरे साथ बनेगी

ये क्या है कि बढ़ते चलो बढ़ते चलो आगे
जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी

2- 
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ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो

ज़िंदगी ये तो नहीं तुझ को सँवारा ही न हो
कुछ न कुछ हम ने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो

दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी
चौंक उठता हूँ कहीं तू ने पुकारा ही न हो

कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर
सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो

ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझ को
दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो

शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ
न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो

3-

लाख आवारा सही शहरों के फ़ुटपाथों पे हम

लाख आवारा सही शहरों के फ़ुटपाथों पे हम
लाश ये किस की लिए फिरते हैं इन हाथों पे हम

अब उन्हीं बातों को सुनते हैं तो आती है हँसी
बे-तरह ईमान ले आए थे जिन बातों पे हम

कोई भी मौसम हो दिल की आग कम होती नहीं
मुफ़्त का इल्ज़ाम रख देते हैं बरसातों पे हम

ज़ुल्फ़ से छनती हुई उस के बदन की ताबिशें
हँस दिया करते थे अक्सर चाँदनी रातों पे हम

अब उन्हें पहचानते भी शर्म आती है हमें
फ़ख़्र करते थे कभी जिन की मुलाक़ातों पे हम
2 वर्ष पहले
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