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Hindi Ghazal: ज्यों ही मेल-मिलाप समझ आने लगते हैं

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            ज्यों ही मेल-मिलाप समझ आने लगते हैं
        
                                                    
                            
सभी मरम चुपचाप समझ आने लगते हैं
 
कौओं के कुल में जब कुहू-कुहू होती है
सारे क्रिया-कलाप समझ आने लगते हैं 
 
डाली से पत्ते की भाँति बिछड़ कर देखो
सारे पुण्य और पाप समझ आने लगते हैं
 
नर से नारायण बस वो ही बन पाता है
जिसको पश्चात्ताप समझ आने लगते हैं
 
स्वयं समय जब तबला-वादक बन जाता है
सारे स्वर-आलाप समझ आने लगते हैं
 
छत्र पिता का जब सर से उठ जाता है तब
सारे सुख-सन्ताप समझ आने लगते हैं

~ नवीन सी. चतुर्वेदी

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