मेरी तक़दीर का मंज़र तो देखो
तुम्हारे हाथ में खंजर तो देखो
बहारों ने चमन कैसा सजाया
खिले हैं शाख पर पत्थर तो देखो
सहेजे ख़ार तोड़े फूल सारे
मिरे गुलशन का दीदावर तो देखो
हमारे घर में घर जैसा नहीं कुछ
दरो- दीवार का ये घर तो देखो
कहाँ जाती हैं ये बेचैन लहरें
कभी इस धार में बहकर तो देखो
है कितनी धुन्ध बाहर आस्मां में
दरीचों से कभी बाहर तो देखो
चुभे वो दिल में जैसे तीर कोई
मुहब्बत में ज़रा तेवर तो देखो
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रहे है ताक में वो रहज़नी के
हमारे दौर का रहबर तो देखो
हदों के पार उमड़ा जा रहा है
मेरी आँखों का ये सागर तो देखो
मोहब्बत में उसे भी लग गया है
नफ़ा-नुक़सान का चक्कर तो देखो
धड़कता है दिले-बेज़ार कैसे
मेरे सीने पे रक्खो सर, तो देखो
स्रोत:- ख़्वाबों की हँसी, हरिओम (वाणी प्रकाशन)