महक रही है ज़मीं चाँदनी के फूलों से
ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है
~ बशीर बद्र
याद के चाँद दिल में उतरते रहे
चाँदनी जगमगाती रही रात भर
~ मख़दूम मुहिउद्दीन
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रात को चाँदनी तो ओढ़ा दो
दिन की चादर अभी उतारी है
~ गुलज़ार
बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की
चाँद भी ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी
~ परवीन शाकिर
वो कौन था जो दिन के उजाले में खो गया
ये चाँद किस को ढूँडने निकला है शाम से
~ आदिल मंसूरी
चाँद भी हैरान दरिया भी परेशानी में है
अक्स किस का है कि इतनी रौशनी पानी में है
~ फ़रहत एहसास
चाँदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी
~ दुष्यंत कुमार
वो चाँदनी में फिरते हैं घर घर ये शोर है
निकला है आफ़्ताब शब-ए-माहताब में
~ जलील मानिकपूरी
पूछा जो उन से चाँद निकलता है किस तरह
ज़ुल्फ़ों को रुख़ पे डाल के झटका दिया कि यूँ
~ आरज़ू लखनवी
बेचैन इस क़दर था कि सोया न रात भर
पलकों से लिख रहा था तिरा नाम चाँद पर
~ अज्ञात