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गुलज़ार: कंधे झुक जाते हैं जब बोझ से इस लम्बे सफ़र के

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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कंधे झुक जाते हैं जब बोझ से इस लम्बे सफ़र के
हाँप जाता हूँ मैं जब चढ़ते हुए तेज़ चढ़ानें
साँसें रह जाती हैं जब सीने में इक गुच्छा सा हो कर
और लगता है कि दम टूट ही जाएगा यहीं पर

एक नन्ही सी मेरी नज़्म सामने आ कर
मुझ से कहती है मिरा हाथ पकड़ कर, मेरे शाएर
ला, मेरे कंधों पर रख दे, मैं तिरा बोझ उठा लूँ! 
 
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7 महीने पहले
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