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गुलज़ार: तुझ को देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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तुझ को देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए
कुछ भँवर डूब गए पानी में चकराते हुए

हम ने तो रात को दाँतों से पकड़ कर रक्खा
छीना-झपटी में उफ़ुक़ खुलता गया जाते हुए

मैं न हूँगा तो ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी
शोख़ पत्ते ने कहा शाख़ से मुरझाते हुए

हसरतें अपनी बिलक्तीं न यतीमों की तरह
हम को आवाज़ ही दे लेते ज़रा जाते हुए

सी लिए होंट वो पाकीज़ा निगाहें सुन कर
मैली हो जाती है आवाज़ भी दोहराते हुए
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