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सूफ़ी ग़ज़ल: यार को हम ने जा-ब-जा देखा

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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यार को हम ने जा-ब-जा देखा
कहीं ज़ाहिर कहीं छुपा देखा

कहीं मुमकिन हुआ कहीं वाजिब
कहीं फ़ानी कहीं बक़ा देखा

दीद अपने की थी उसे ख़्वाहिश
आप को हर तरह बना देखा

सूरत-ए-गुल में खिल-खिला के हँसा
शक्ल-ए-बुलबुल में चहचहा देखा

शम्अ' हो कर के और परवाना
आप को आप में जला देखा

कर के दा'वा कहीं अनल-हक़ का
बर-सर-ए-दार वो खिंचा देखा

था वो बरतर शुमा-ओ-मा से नियाज़
फिर वही अब शुमा-ओ-मा देखा

कहीं है बादशाह-ए-तख़्त-नशीं
कहीं कासा लिए गदा देखा

कहीं आबिद बना कहीं ज़ाहिद
कहीं रिंदों का पेशवा देखा

कहीं वो दर-लिबास-ए-मा'शूक़ाँ
बर-सर-ए-नाज़ और अदा देखा

कहीं आशिक़ 'नियाज़' की सूरत
सीना-ए-बिरयाँ ओ दिल-जला देखा
- शाह नियाज़ अहमद बरेलवी 
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6 महीने पहले
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