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महात्मा गांधी : रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'बापू'

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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जो कुछ था देय, दिया तुमने, सब लेकर भी


हम हाथ पसारे हुए खड़े हैं आशा में;
लेकिन, छींटों के आगे जीभ नहीं खुलती,
बेबसी बोलती है आँसू की भाषा में।

वसुधा को सागर से निकाल बाहर लाये,
किरणों का बन्धन काट उन्हें उन्मुक्त किया,
आँसुओं-पसीनों से न आग जब बुझ पायी,
बापू! तुमने आखिर को अपना रक्त दिया।
5 वर्ष पहले
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