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Dushyant Kumar Poetry: चांदनी छत पे चल रही होगी

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            चांदनी छत पे चल रही होगी
        
                                                    
                            
अब अकेली टहल रही होगी

फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा
बर्फ़-सी वो पिघल रही होगी

कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी

सोचता हूँ कि बंद कमरे में
एक शमअ-सी जल रही होगी

तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फ़सल रही होगी

जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी

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एक वर्ष पहले
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Sanjai kumar

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