विज्ञापन

Nasir Kazmi Poetry: नसीर काज़मी की ग़ज़ल 'दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया'

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया

वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई


वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया

जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए


तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया

पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें


ज़मीं निगल गई उन्हें कि आसमान खा गया

ये सुब्ह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ


अब आइने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया

ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई


वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ समा गया

गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक


अलम-कशो उठो कि आफ़्ताब सर पे आ गया

2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12570 कविताएं

View Profile

User

26 कविताएं

View Profile

Gurjeet Kaur

14 कविताएं

View Profile

श्री सनातन

495 कविताएं

View Profile