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अमजद इस्लाम अमजद की ग़ज़ल: चेहरे पे मिरे ज़ुल्फ़ को फैलाओ किसी दिन

काव्य डेस्क

Urdu Adab
                                    
                     
                                                  चेहरे पे मिरे ज़ुल्फ़ को फैलाओ किसी दिन 
क्या रोज़ गरजते हो बरस जाओ किसी दिन 

राज़ों की तरह उतरो मिरे दिल में किसी शब 
दस्तक पे मिरे हाथ की खुल जाओ किसी दिन 

पेड़ों की तरह हुस्न की बारिश में नहा लूँ 
बादल की तरह झूम के घर आओ किसी दिन 

ख़ुशबू की तरह गुज़रो मिरी दिल की गली से 
फूलों की तरह मुझ पे बिखर जाओ किसी दिन 
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गुज़रें जो मेरे घर से तो रुक जाएँ सितारे 
इस तरह मिरी रात को चमकाओ किसी दिन 

मैं अपनी हर इक साँस उसी रात को दे दूँ 
सर रख के मिरे सीने पे सो जाओ किसी दिन 

2 वर्ष पहले
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Chandra prakash

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