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अमीर मीनाई: ऐ ज़ब्त देख इश्क़ की उन को ख़बर न हो

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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ऐ ज़ब्त देख 'इश्क़ की उन को ख़बर न हो
दिल में हज़ार दर्द उठे आँख तर न हो

मुद्दत में शाम-ए-वस्ल हुई है मुझे नसीब
दो-चार साल तक तो इलाही सहर न हो

इक फूल है गुलाब का आज उन के हाथ में
धड़का मुझे ये है कि किसी का जिगर न हो

ढूँडे से भी न मअ'नी-ए-बारीक जब मिला
धोका हुआ ये मुझ को कि उस की कमर न हो

उल्फ़त की क्या उमीद वो ऐसा है बेवफ़ा
सोहबत हज़ार साल रहे कुछ असर न हो

तूल-ए-शब-ए-विसाल हो मिस्ल-ए-शब-ए-फ़िराक़
निकले न आफ़्ताब इलाही सहर न हो
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