विज्ञापन

अहमद मुश्ताक़: मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है

काव्य डेस्क

Urdu Adab
विज्ञापन
                                    
                                                                        
                            


मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है
वो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता है

जिस की साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे
ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है

इक ज़माना था कि सब एक जगह रहते थे
और अब कोई कहीं कोई कहीं रहता है

रोज़ मिलने पे भी लगता था कि जुग बीत गए
इश्क़ में वक़्त का एहसास नहीं रहता है

दिल फ़सुर्दा तो हुआ देख के उस को लेकिन
उम्र भर कौन जवाँ कौन हसीं रहता है
हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।
9 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10845 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7356 कविताएं

View Profile