'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- परिमाण, जिसका अर्थ है- भार, विस्तार, वह मान जो नाप या तौल के द्वारा जाना जाय। प्रस्तुत है अज्ञेय की कविता- धुँध से ढँकी हुई
धुँध से ढँकी हुई
कितनी गहरी वापिका तुम्हारी
कितनी लघु अंजली हमारी ।
कुहरे में जहाँ-तहाँ लहराती-सी कोई
छाया जब-तब दिख जाती है,
उत्कण्ठा की ओक वही द्रव भर ओठों तक लाती है-
बिजली की जलती रेखा-सी
कण्ठ चीरती छाती तक खिंच जाती है ।
फिर और प्यास तरसाती है,
फिर दीठ
धुँध में फाँक खोजने को टकटकी लगाती है ।
आतुरता हमें भुलाती है
कितनी लघु अंजली हमारी,
कितनी गहरी यह धुँध-ढँकी वापिका तुम्हारी ।
फिर भरते हैं ओक,
लहर का वृत्त फैल कर हो जाता है ओझल,
इसी भाँति युग-कल्प शिलित कर गए हमारे पल-पल
-वापी को जो धुँध ढँके है, छा लेती है
गिरि-गह्वर भी अविरल ।
किंतु एक दिन खुल जाएगा
स्फटिक-मुकुर-सा निर्मल वापी का तल,
आशा का आग्रह हमेम किए है बेकल-
धुँध-ढँकी
कितनी गहरी वापिका तुम्हारी,
कितनी लघु अंजली हमारी ।
किन्तु नहीं क्या यही धुँध है सदावर्त
जिस में नीरन्ध्र तुम्हारी करुणा
बँटती रहती है दिन-याम ?
कभी झाँक जाने वाली छाया ही
अन्तिम भाषा-सम्भव-नाम ?
करुणा-धाम !
बीज-मन्त्र यह, सार-सूत्र यह, गहराई का एक यही परिमाण
हमारा यही प्रणाम !
धुँध-ढँकी
कितनी गहरी वापिका तुम्हारी-
लघु अंजली हमारी ।
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