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जॉन एलिया : टॉप 20 शायरी

काव्य डेस्क

Irshaad
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                                                  बहुत नज़दीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या

मुझ से बिछड़ कर भी वो लड़की कितनी ख़ुश ख़ुश रहती है 
उस लड़की ने मुझ से बिछड़ कर मर जाने की ठानी थी 

तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई है 
तेरे साथ तेरी याद आई क्या तू सचमुच आई है 

बिन तुम्हारे कभी नहीं आई 
क्या मेरी नींद भी तुम्हारी है 

सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर 
अब किसे रात भर जगाती है 

कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई 
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया 

मुझ को ये होश ही न था तू मेरे बाज़ुओं में है 
यानी तुझे अभी तलक मैंने रिहा नहीं किया 

अब जो रिश्तों में बँधा हूँ तो खुला है मुझ पर 
कब परिंद उड़ नहीं पाते हैं परों के होते 

ज़िंदगी किस तरह बसर होगी 
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में 

ऐ ख़ुदा जो कहीं नहीं मौजूद 
क्या लिखा है हमारी क़िस्मत में 
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'मिल रही हो बड़े तपाक के साथ...'

हर शख़्स से बे-नियाज़ हो जा
फिर सब से ये कह कि मैं ख़ुदा हूँ 

सब मेरे बग़ैर मुतमइन हैं 
मैं सब के बग़ैर जी रहा हूँ 

क्या है जो बदल गई है दुनिया 
मैं भी तो बहुत बदल गया हूँ 

गो अपने हज़ार नाम रख लूँ 
पर अपने सिवा मैं और क्या हूँ 

जो गुज़ारी न जा सकी हम से 
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है 

ज़ख़्म-हा-ज़ख़्म हूँ और कोई नहीं ख़ून का निशाँ 
कौन है वो जो मेरे ख़ून में तर है मुझ में 

इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ
वरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैंने 

मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस 
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं 

क्या सितम है कि अब तेरी सूरत 
ग़ौर करने पर याद आती है 

मिल रही हो बड़े तपाक के साथ 
मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या 

- जॉन एलिया 

साभार - रेख़्ता
8 वर्ष पहले
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