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कुंवर नारायणः सुबह हो रही थी 

काव्य डेस्क

Irshaad
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                            सुबह हो रही थी 
        
                                                    
                            
सुबह हो रही थी
कि एक चमत्कार हुआ
आशा की एक किरण ने
किसी बच्ची की तरह
कमरे में झांका
कमरा जगमगा उठा
"आओ अंदर आओ, मुझे उठाओ"
शायद मेरी खामोशी गूंज उठी थी।

कभी पाना मुझे
तुम अभी आग ही आग
मैं बुझता चिराग 
हवा से भी अधिक अस्थिर हाथों से
पकड़ता एक किरण का स्पन्द
पानी पर लिखता एक छंद
बनाता एक आभा-चित्र
और डूब जाता अतल में
एक सीपी में बंद
कभी पाना मुझे
सदियों बाद
दो गोलाद्धों के बीच
झूमते एक मोती में।

घंटी
फोन की घंटी बजी
मैंने कहा—मैं नहीं हूं
और करवट बदल कर सो गया।
दरवाजे की घंटी बजी
मैंने कहा— मैं नहीं हूं
और करवट बदल कर सो गया।
अलार्म की घंटी बजी
मैंने कहा— मैं नहीं हूं
और करवट बदल कर सो गया।
एक दिन 
मौत की घंटी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा—
मैं हूं... मैं हूं... मैं हूं...
मौत ने कहा—
करवट बदल कर सो जाओ।

दुनिया की चिंता
छोटी सी दुनिया
बड़े-बड़े इलाके
हर इलाके के
बड़े-बड़े लड़ाके
हर लड़ाके की
बड़ी-बड़ी बंदूकें
हर बंदूक के बड़े-बड़े धड़ाके
सबको दुनिया की चिंता
सबसे दुनिया को चिंताा।
8 वर्ष पहले
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