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ज़ुबैर रिज़वी की ग़ज़ल: हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                                                  हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे 
थक गए तो ख़्वाब की दहलीज़ पर सोते रहे 

ज़िंदगी ने हाथ से ख़ंजर न रखा एक पल 
हम क़तील-ए-ग़म्ज़ा-ओ-नाज़-ए-बुताँ होते रहे 

लोक लहजे का सुहाना-पन सुख़न की नग़्मगी 
शहर की आबादियों के शोर में खोते रहे 

क्यूँ मता-ए-दिल के लुट जाने का कोई ग़म करे 
शहर-ए-दिल्ली में तो ऐसे वाक़िए होते रहे 
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सुर्ख़ियाँ अख़बार की गलियों में ग़ुल करती रहीं 
लोग अपने बंद कमरों में पड़े सोते रहे 

महफ़िलों में हम रफ़ीक़-ओ-राज़-दाँ समझे गए 
घर के आँगन में मगर तन्हाइयाँ बोते रहे 
2 वर्ष पहले
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