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आज का शब्द: एकल और गिरिराज किराडू की कविता- जहाँ कच्ची ईंटें बनती हैं

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
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                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- एकल, जिसका अर्थ है- अकेला, अनुपम, बेजोड़। प्रस्तुत है गिरिराज किराडू की कविता-  जहाँ कच्ची ईंटें बनती हैं
        
                                                    
                            

जहाँ कच्ची ईंटें बनती हैं उस जगह को देखते हुए लगता कई घर खड़े हैं 
बल्कि थोड़ी ऊँचाई 
जैसे कि छत से 
दिखता कि 
कोई बस्ती-सी है 
बल्कि थोड़ी और ऊँचाई 
जैसे कि आकाश से 
मालूम होता कि 
कोई नगर है एक दूसरे के आँगन में खुलते कई दरवाज़ें हैं शामियाने जैसी 
लंबी एकल छत है दरारों जैसी गलियाँ हैं जिनमें अपने बचपन में हम कई 
एक दूसरे को ढूँढ़ रहे हैं 
बल्कि थोड़ी और ऊँचाई 
जैसे कि कविता से 
झाँकता कि 
शामियाना कई छतों में विसर्जित हो रहा है दरारें गलियों में बँट रही हैं ढूँढ़ना 
छिपने में खुल रहा है घर 
फिर से ईंटें हुए जा रहे हैं 
और 
वे इतनी कोमल हैं कि हम देखने से वापस लौटते हुए कई सारी थैले में भर लाए हैं 

2 वर्ष पहले
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