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आज का शब्द: आवर्तन और जगदीश गुप्त की कविता- पानी गहरा है पर थाह नहीं पाता हूँ

काव्य डेस्क

Aaj Ka Shabd
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                                                  'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- आवर्तन, जिसका अर्थ है- चारो ओर घूमना या चक्कर लगाना, घुमाव, मथना, हिलाना। प्रस्तुत है जगदीश गुप्त की कविता- पानी गहरा है पर थाह नहीं पाता हूँ

पानी गहरा है पर थाह नहीं पाता हूँ।
लहरों में अनचाहे लहर-लहर जाता हूँ।

कोलाहल धूल भरा तट कब का छोड़ चुका।
मन की दुर्बलताओं के बन्धन तोड़ चुका।
पर जाने क्या है —
जब गहरे में चलने को होता हूँ
ठहर ठहर जाता हूँ।
पानी गहरा है पर थाह नहीं पाता हूँ।
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झिलमिल जल की सतहों बीच सत्य दीख रहा।
उसमें घुल जाने को।
अपने ही पाने को।
साँस साँस तड़प रही - रोम रोम चीख़ रहा।
माना यह तत्वों की, मिट्टी की, जल की है।
मन की तुलना में पर देह बहुत हलकी है।
इसको तट ही प्रिय है, चाह नहीं तल की है।
इसके निर्मम हलकेपन से ही बन्धा बन्धा,
जल के आवर्तन में छहर छहर जाता हूँ।
पानी गहरा है पर थाह नहीं पाता हूँ।
4 वर्ष पहले
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